
अक्सर सरकारी तंत्र पर सुस्ती और संवेदनहीनता के आरोप लगते हैं, लेकिन जब कोई अधिकारी अपनी कुर्सी के दायित्व से आगे बढ़कर ‘इंसानियत’ का फर्ज निभाता है, तो समाज में उम्मीद की नई किरण जगती है। डूंगरपुर जिले की ग्राम पंचायत ओबरी से एक ऐसी ही भावुक और प्रेरक तस्वीर सामने आई है, जिसने सिस्टम पर लोगों के भरोसे को फिर से मजबूत कर दिया है।
क्या था पूरा मामला?
यह कहानी ओबरी गाँव की तीन मासूम सगी बहनों की है। नियति ने इन बच्चियों के सिर से माता-पिता का साया बहुत पहले छीन लिया था। घर में कोई कमाने वाला नहीं था और न ही उन्हें मार्गदर्शन देने वाला कोई अपना बचा था। राजस्थान सरकार अनाथ बच्चों के लिए ‘पालनहार योजना’ चलाती है, लेकिन जानकारी के अभाव और कागजी कार्यवाही की जटिलताओं के डर से ये बहनें इस योजना के लाभ से वंचित थीं। वे अभावों में जीवन जीने को मजबूर थीं।
प्रशासक की पहल ने बदली तस्वीर
जब इस परिवार की व्यथा ग्राम पंचायत ओबरी के प्रशासक के संज्ञान में आई, तो उन्होंने इसे महज एक सरकारी फाइल नहीं समझा। उन्होंने तुरंत संवेदनशीलता दिखाई और मामले की तह तक गए। प्रशासक ने न केवल खुद पहल की, बल्कि पंचायत के कर्मचारियों को निर्देशित कर तत्काल प्रभाव से बच्चियों के दस्तावेज तैयार करवाए। जिस काम के लिए ये बच्चियाँ शायद महीनों भटकतीं, वह काम प्रशासन की तत्परता से चुटकियों में हो गया।
अब मिलेगा पूरा हक
प्रशासक और उनकी टीम के प्रयासों का ही नतीजा है कि अब इन तीनों बहनों को ‘पालनहार योजना’ से जोड़ दिया गया है। अब उन्हें सरकार की ओर से हर महीने आर्थिक सहायता और अन्य लाभ सीधे मिलने शुरू हो जाएंगे। इससे न केवल उनकी शिक्षा जारी रह सकेगी, बल्कि भरण-पोषण की चिंता भी दूर होगी।
सिस्टम पर बढ़ा भरोसा
ओबरी पंचायत की इस पहल की पूरे जिले में सराहना हो रही है। यह घटना साबित करती है कि अगर प्रशासनिक कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के मन में सेवा का भाव हो, तो नियमों की पेचीदगियां कभी आड़े नहीं आतीं। ओबरी से उठी यह मानवता की उम्मीद बताती है कि प्रशासन और जनता के बीच की दूरी को केवल संवेदनशीलता से ही पाटा जा सकता है।

