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डूंगरपुर: वागड़ के पलाश की महक अब ‘गुलाबी नगरी’ और गुजरात तक, हर्बल गुलाल से चमक रही महिलाओं की किस्मत

डूंगरपुर होली के त्योहार की आहट के साथ ही वागड़ के जंगलों में खिले पलाश के फूलों की रंगत अब केवल स्थानीय गलियों तक सीमित नहीं रही है. डूंगरपुर की ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किया गया ‘हर्बल गुलाल’ अब राजस्थान की राजधानी जयपुर सहित कई अन्य जिलों और पड़ोसी राज्य गुजरात के बाजारों को भी सराबोर कर रहा है. राजीविका के तहत स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ये महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं.

केमिकल मुक्त और त्वचा के लिए सुरक्षित

बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त रंगों के दुष्प्रभावों के बीच रामगढ़ गांव की वन धन समूह की महिलाओं ने पूरी तरह प्राकृतिक विकल्प पेश किया है. समूह की सदस्य गायत्री ननोमा ने बताया कि करीब 50 महिलाओं की टीम होली से एक माह पूर्व ही इस कार्य में जुट जाती है.

यह गुलाल पूरी तरह शुद्ध और सुरक्षित है क्योंकि इसे बनाने में किसी भी कृत्रिम रसायन का प्रयोग नहीं होता:

  • पलाश के फूल: जंगलों से पलाश के फूल इकट्ठा कर मुख्य रंग तैयार किया जाता है.
  • प्राकृतिक मिश्रण: गेंदा, रजनीगंधा और चुकंदर जैसे प्राकृतिक उत्पादों को गर्म पानी में उबालकर रंग निकाला जाता है.
  • प्रक्रिया: इन रंगों को सुखाकर और छानकर शुद्ध हर्बल गुलाल तैयार किया जाता है और आकर्षक पैकिंग की जाती है. इस वर्ष समूह ने 5 क्विंटल गुलाल तैयार करने का लक्ष्य रखा है.

रोजगार का बना सशक्त माध्यम

यह पहल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि स्थानीय महिलाओं के लिए आर्थिक संबल का मजबूत आधार भी बनी है.

  • आय: काम में जुटी महिलाओं को प्रतिदिन 250 रुपये मजदूरी मिलती है.
  • कीमत: वर्तमान में यह गुलाल 25 रुपये प्रति 100 ग्राम की दर से बेचा जा रहा है.
  • बाजार: डूंगरपुर से यह गुलाल उदयपुर के रास्ते जयपुर भेजा जाता है। साथ ही, गुजरात में भी हर साल 30 से 40 किलोग्राम गुलाल की सप्लाई की जा रही है.

निष्कर्ष: डूंगरपुर की इन महिलाओं ने साबित कर दिया है कि यदि पारंपरिक ज्ञान को राजीविका जैसी सरकारी योजनाओं का साथ मिले, तो ग्रामीण अंचलों में भी आर्थिक क्रांति लाई जा सकती है. ‘वेस्ट से बेस्ट’ बनाने की यह कला ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का जीवंत उदाहरण है.

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