आसपुर (डूंगरपुर) वागड़ के प्रयाग और आदिवासियों के सबसे बड़े महाकुंभ बेणेश्वर धाम पर गुरुवार को माघ शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर 10 दिवसीय मेले का विधिवत शुभारंभ हुआ. धाम के पीठाधीश्वर महंत अच्युतानंद महाराज के सानिध्य में सप्तरंगी ध्वजा के पूजन और मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण के साथ ही समूचा परिसर संत मावजी महाराज के जयकारों से गुंजायमान हो उठा.
परंपरागत तरीके से हुआ शुभारंभ
गुरुवार सुबह मधुर वेला में पंडित हिमांशु पंड्या के वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच राधा-कृष्ण मंदिर के शिखर पर सप्तरंगी ध्वजा फहराई गई. इस दौरान बड़ी संख्या में मौजूद साद समाज के भक्तों ने मावजी महाराज की भविष्यवाणियों और भजनों का गान किया, जिससे श्रद्धालु भक्ति की सरिता में सराबोर नजर आए.
संत मावजी की तपोस्थली और जनजातीय चेतना
मान्यता है कि करीब 300 वर्ष पूर्व अलौकिक संत और भविष्यवक्ता संत मावजी महाराज ने माही, सोम और जाखम नदी के पवित्र संगम पर तपस्या की थी. उन्होंने जनजातीय समाज में सामाजिक चेतना जागृत करने के लिए अभूतपूर्व प्रयास किए. उनकी याद में हर वर्ष माघ पूर्णिमा पर यहाँ विशाल मेला भरता है. विशेष बात यह है कि एकादशी के दिन ही साबला गांव में संत मावजी का जन्म हुआ था, इसीलिए इसी दिन मेले का श्रीगणेश किया जाता है.
तीन राज्यों की संस्कृति का मिलन
10 दिनों तक चलने वाला यह मेला केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश और गुजरात के श्रद्धालुओं के लिए भी मुख्य त्योहार है. संगम पर पवित्र डुबकी लगाने के बाद भक्त भगवान शिव (बेणेश्वर महादेव) और भगवान विष्णु के अवतार मावजी महाराज के दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं.
मनोरंजन और आस्था का संगम
मेले में श्रद्धालुओं के लिए जादुई तमाशे, करतब और मनोरंजन के विभिन्न साधनों के साथ-साथ शाम को लोक कलाकारों द्वारा संगीत एवं नृत्य की प्रस्तुतियां दी जाएंगी. हालांकि, मेले में 10 दिन तक रौनक रहती है, लेकिन माघ पूर्णिमा के दिन होने वाला ‘शाही स्नान’ मुख्य आकर्षण होता है, जिसे देखने और पवित्र डुबकी लगाने के लिए लाखों का हुजूम उमड़ता है. इसे ‘वागड़ का हरिद्वार’ भी कहा जाता है.

