राजस्थान के वागड़ अंचल, विशेषकर डूंगरपुर जिले में राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है. एक ओर जहाँ भाजपा और कांग्रेस के बीच ‘घोटालों’ को लेकर जुबानी जंग जारी है, वहीं दूसरी ओर आगामी स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों से पहले ओबीसी (OBC) और एमबीसी (MBC) संगठनों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.
भाजपा का कांग्रेस पर तीखा वार
हाल ही में भाजपा जिलाध्यक्ष अशोक पटेल ने कांग्रेस विधायक गणेश घोघरा के आरोपों को सिरे से नकारते हुए इसे ‘हार की हताशा’ बताया. पटेल ने कांग्रेस के शासनकाल में टीएडी विभाग में हुए फर्नीचर और सामग्री सप्लाई घोटालों का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए विधायक को अपनी मर्यादा में रहने की नसीहत दी. भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस अब विकास के मुद्दों से भटक कर व्यक्तिगत लांछन पर उतर आई है.
आरक्षण का मुद्दा: चुनावों पर संकट के बादल?
सिर्फ दलगत राजनीति ही नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरण भी डूंगरपुर की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं. मार्च-अप्रैल 2026 में होने वाले पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों से पहले टीएसपी क्षेत्र में आरक्षण की मांग तेज हो गई है:
- चुनावी बहिष्कार की चेतावनी: ओबीसी अधिकार मंच और अन्य संगठनों ने डूंगरपुर कलेक्ट्रेट पर पोस्टर लगाकर चुनावों के बहिष्कार का ऐलान किया है.
- प्रमुख मांग: इनका तर्क है कि टीएसपी क्षेत्र में ओबीसी और एमबीसी वर्ग को उनकी जनसंख्या के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है.
- राजनीतिक दबाव: संगठनों का कहना है कि यह विरोध केवल भाजपा या कांग्रेस के खिलाफ नहीं, बल्कि बीएपी (BAP) सहित उन सभी दलों के खिलाफ है जो उनके हक की बात नहीं करते.
मनरेगा और बजट को लेकर आरोप-प्रत्यारोप
बीएपी सांसद राजकुमार रोत ने भी सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि बजट की कमी के कारण डूंगरपुर में मनरेगा श्रमिकों का भुगतान अटका हुआ है. वहीं, भाजपा के पूर्व मंत्री सुशील कटारा ने केंद्र के बजट और ‘जी रामजी योजना’ को श्रमिकों के लिए क्रांतिकारी कदम बताते हुए विपक्ष के दावों को खारिज किया है.
निष्कर्ष: डूंगरपुर की राजनीति अब केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष की लड़ाई तक सीमित नहीं रह गई है. यहाँ अब आरक्षण, भ्रष्टाचार और विकास की योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनी हुई है.

