डूंगरपुर भारत के मूल निवासी आदिवासी समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए अब मांग तेज होने लगी है. गुरुवार को जिला कांग्रेस कमेटी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और समाज के प्रतिनिधियों ने जिला कलेक्ट्रेट पर जोरदार प्रदर्शन किया. इस दौरान जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग से ‘धर्म कोड’ (Religion Code) लागू करने की मांग उठाई गई.
राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन
प्रदर्शन के बाद कांग्रेस पदाधिकारियों ने जिला कलेक्टर को महामहिम राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन सौंपा. ज्ञापन में विस्तार से बताया गया कि आदिवासी समुदाय इस देश का प्राचीनतम मूल निवासी है. इस समुदाय की अपनी अनूठी परंपराएं, रीति-रिवाज और धार्मिक मान्यताएं हैं, जो प्रचलित मुख्यधारा के धर्मों से पूरी तरह भिन्न हैं. आदिवासियों को संविधान और इतिहास में ट्राइब, ट्राइबल और अनुसूचित जनजाति जैसे नामों से संबोधित किया गया है.
ऐतिहासिक तथ्यों का दिया हवाला
कांग्रेस द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में ऐतिहासिक दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि:
- आजादी से पहले की स्थिति: 1874 के ‘शेड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट एक्ट’ और 1919 व 1935 के ‘भारत सरकार अधिनियम’ में भी आदिवासी समुदाय की पृथक धार्मिक पहचान को स्वीकार किया गया था.
- जनगणना का इतिहास: वर्ष 1871 से लेकर 1950 तक हुई सभी जनगणनाओं में आदिवासियों के लिए एक अलग कॉलम निर्धारित था, जिसे बाद में हटा दिया गया.
अस्तित्व बचाने की लड़ाई
नेताओं ने कहा कि ऐतिहासिक और संवैधानिक तथ्यों से यह स्पष्ट है कि आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान स्वतंत्र रही है. वर्तमान में जनगणना में अलग कॉलम नहीं होने से इस समुदाय की वास्तविक संख्या और उनकी विशिष्ट पहचान ओझल हो रही है. समुदाय की परंपराओं, जल-जंगल-जमीन से जुड़ी संस्कृति और उनके अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए ‘पृथक धर्म कोड’ अनिवार्य है.

