राजस्थान का आदिवासी बहुल डूंगरपुर जिला अपनी समृद्ध संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए जाना जाता है. यहाँ होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, साहस और प्राचीन मान्यताओं का संगम है. जिले के कोकापुर और भीलूड़ा गांवों में आयोजित होने वाली परंपराएं इतनी हैरान करने वाली हैं कि इन्हें देखने देशभर से लोग जुटते हैं.
कोकापुर: दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलते हैं ग्रामीण
कोकापुर गांव में होली के अगले दिन एक ऐसा दृश्य देखने को मिलता है जिसे देख आंखें फटी रह जाएं. यहाँ ‘होलिका दहन’ के बाद दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलने की परंपरा है.
- मान्यता: ग्रामीणों का विश्वास है कि जलती होली के अंगारों पर चलने से गांव पर कोई विपदा नहीं आती और ग्रामीण साल भर स्वस्थ रहते हैं.
- आस्था का सैलाब: हजारों की भीड़ के बीच ग्रामीण पूरी श्रद्धा के साथ इन अंगारों पर चहलकदमी करते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा में अब तक कोई अनहोनी नहीं हुई है.
भीलूड़ा: पत्थरों की ‘राड़’ और बहता खून माना जाता है शुभ

वहीं, जिले के भीलूड़ा गांव में पिछले 200 वर्षों से ‘पत्थरमार होली’ खेली जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘पत्थरों की राड़’ कहा जाता है.
- कैसे होता है खेल: धुलंडी के दिन रघुनाथ मंदिर परिसर में दो टोलियां आमने-सामने होती हैं. हाथों में गोफन, ढाल और पत्थर लिए ये लोग एक-दूसरे पर पत्थरों की बारिश करते हैं.
- शगुन की चोट: इस खेल में कई लोग लहूलुहान हो जाते हैं, लेकिन यहाँ खून बहने को आगामी वर्ष के लिए ‘शुभ शगुन’ माना जाता है. घायलों के उपचार के लिए मौके पर डॉक्टरों की विशेष टीम तैनात रहती है.
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
इन परंपराओं के अलावा देवल और जेठाना गांवों में पारंपरिक ‘गेर’ नृत्य की धूम रहती है. वागड़ की यह होली भारतीय संस्कृति के उस विविध स्वरूप को दर्शाती है, जहाँ जोखिम और रोमांच भी उत्सव का हिस्सा हैं. पत्थरमार होली हो या अंगारों पर चलना, ये परंपराएं आज भी नई पीढ़ी के बीच उतनी ही जीवंत हैं.

