बांसवाड़ा अनास नदी की कलकल बहती जलधारा और दुर्गम अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित वागड़ के सुप्रसिद्ध भवानपुरा भैरवजी मंदिर पर सात दिवसीय मेले का शुक्रवार को भव्य समापन हुआ. मेले के अंतिम दिन आयोजित पारंपरिक ‘गोबर के कण्डों की राड़’ मुख्य आकर्षण रही, जिसे देखने और भाग लेने के लिए राजस्थान सहित पड़ोसी राज्यों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़े.
35 वर्षों की परंपरा और ‘कण्डों की राड़’

भैरवजी मंदिर विकास समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीया ने बताया कि इस दुर्गम तीर्थ पर पिछले 35 वर्षों से मेले का आयोजन निरंतर किया जा रहा है. यहाँ गोबर के कंडों से ‘राड़’ खेलने की परंपरा सदियों पुरानी है. ढोल-नगाड़ों की थाप पर जब श्रद्धालु उत्साह के साथ इस परंपरा का निर्वहन करते हैं, तो पूरा पहाड़ी क्षेत्र भक्तिमय माहौल से गूंज उठता है. मालवीया ने कहा कि यह तीर्थ क्षेत्र की आस्था और सांस्कृतिक एकता का एक बड़ा प्रतीक बन चुका है.
प्रकृति और भक्ति का अद्भुत संगम
मेले का सबसे खास आकर्षण मंदिर की भौगोलिक स्थिति रही. ऊंचे पहाड़ों और अनास नदी के तट पर स्थित होने के कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालु प्रकृति और भक्ति के अनूठे संगम को देख मंत्रमुग्ध नजर आए. मेले के सातों दिन धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और विशेष पूजा-अर्चना का दौर चलता रहा. वागड़ के स्थानीय लोगों के साथ-साथ गुजरात और मध्य प्रदेश से आए श्रद्धालुओं ने भी भैरव बाबा के दरबार में मत्था टेका.
विकास की राह पर भवानपुरा तीर्थ
दुर्गम स्थान होने के बावजूद यहाँ सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है. पूर्व मंत्री मालवीया ने बताया कि मंदिर परिसर में शिवजी और हनुमान जी के मंदिरों के साथ अब माताजी का भव्य मंदिर भी आकार ले रहा है. उन्होंने भविष्य में श्रद्धालुओं की सुगमता के लिए यहाँ पुल निर्माण और अन्य मूलभूत सुविधाओं के विस्तार की योजना पर भी बल दिया.

