उदयपुर मेवाड़ क्षेत्र के भींडर के निकट डेरावड़ स्थित श्री रूपनाथ जी मठ में आस्था और कठिन साधना का एक अद्वितीय उदाहरण देखने को मिला. अप्रैल माह की झुलसा देने वाली गर्मी के बीच, यहाँ आयोजित छठी 21 दिवसीय ‘नव धूणी अग्नि तपस्या’ का गुरुवार को श्रद्धा और उत्साह के साथ भव्य समापन हुआ.
नौ अग्नियों के बीच तीन घंटे की गहन साधना
यह कठिन तपस्या श्री श्री 108 महंत योगी प्रेमनाथ जी महाराज के सान्निध्य में जनकल्याण एवं विश्व शांति की मंगल कामना के साथ आयोजित की गई. समापन के दिन, जब दोपहर में सूर्य देव अपनी चरम तपिश पर थे, तब गुरुदेव नौ प्रज्वलित अग्नियों के मध्य लगभग तीन घंटे तक गहन साधना में लीन रहे. तपती धूप और चारों ओर दहकती अग्नि के बीच महंत जी को साधना करते देख वहां मौजूद श्रद्धालु भक्ति भाव से सराबोर हो उठे.
क्या है नव धूणी तपस्या का महत्व?
गुरुदेव के अनुसार, यह साधना पंच तत्वों—अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश एवं वायु—को साक्षी मानकर की जाती है. इसमें नौ दिशाओं में अग्निकुंड स्थापित किए जाते हैं, जिनमें प्रतिदिन बढ़ती संख्या में गोबर के कंडों से अग्नि प्रज्वलित की जाती है. जल तत्व के लिए कलश स्थापना और आकाश तत्व की प्राप्ति के लिए शरीर पर भभूति धारण कर यह अनुष्ठान संपन्न होता है.
संत-समागम और भक्तिमय माहौल
इस धार्मिक अनुष्ठान के साक्षी बनने के लिए गोगुन्दा से दौलत गिरि जी महाराज, कुंडाल से डालू दास जी महाराज और राजसमंद से पागल नाथ जी महाराज सहित कई संत पधारे. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में देवेंद्र सिंह शक्तावत उपस्थित रहे। माँ हिंगलाज माता की आरती, हवन-पूजन और शिष्यों द्वारा गुरु पूजन के साथ वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया.

