बांसवाड़ा-डूंगरपुर सांसद राजकुमार रोत ने लोकसभा में वित्तीय विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्र सरकार को जमकर घेरा. उन्होंने आदिवासी अंचल की ज्वलंत समस्याओं को सदन के पटल पर रखते हुए कहा कि बजट की सफलता तभी सुनिश्चित होगी, जब इसका लाभ अंतिम छोर पर बैठे गरीब, किसान और आदिवासी परिवार तक पहुँचे. उन्होंने जल जीवन मिशन से लेकर गैस संकट और निजी फाइनेंस कंपनियों द्वारा किए जा रहे शोषण पर तीखे सवाल खड़े किए.
जल जीवन मिशन: जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर
सांसद रोत ने केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ की पोल खोलते हुए कहा कि डूंगरपुर और बांसवाड़ा में यह मिशन 70% तक अधूरा है. उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि बांसवाड़ा में मात्र 37% और डूंगरपुर में लगभग 32% घरों में ही नल कनेक्शन हुए हैं. रोत ने आरोप लगाया कि जो काम हुआ है, वह भी अधिकांशतः केवल कागजों तक सीमित है; धरातल पर कई जगह पाइपलाइन बिछी है लेकिन पानी की आपूर्ति का नामोनिशान नहीं है.
LPG संकट और कालाबाजारी पर प्रहार
राजस्थान में गहराते गैस संकट पर बोलते हुए सांसद ने चुटकी लेते हुए कहा कि हालात इतने बदतर हैं कि मुख्यमंत्री की सभाओं तक में लकड़ी पर खाना बनाना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि खुले बाजार में सिलेंडरों की कालाबाजारी चरम पर है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवार और बाहर रहकर पढ़ाई करने वाले छात्र आर्थिक बोझ तले दब रहे हैं.
माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की ‘लूट’ पर लगाम की मांग
आदिवासी महिलाओं के आर्थिक शोषण का मुद्दा उठाते हुए राजकुमार रोत ने कहा कि क्षेत्र में सक्रिय माइक्रोफाइनेंस कंपनियां 22 से 25 प्रतिशत तक भारी ब्याज वसूल रही हैं. उन्होंने सरकार से इन कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाने और गरीब परिवारों को ऋण माफियाओं के चंगुल से बचाने की पुरजोर मांग की.
मेडिकल कॉलेजों की बदहाली और अन्य माँगें
सांसद ने बांसवाड़ा और डूंगरपुर के मेडिकल कॉलेजों में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुनियादी सुविधाओं के अभाव का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने बताया कि बारिश के दौरान ड्रेनेज व्यवस्था ठप होने से अस्पताल परिसर टापू बन जाते हैं. अपनी अन्य मांगों में उन्होंने डेयरी प्रबंधन की सुविधा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का नियमितीकरण, छात्रों की लंबित छात्रवृत्ति और वित्त आयोग की बकाया राशि जारी करने पर जोर दिया.

