वागड़ अंचल में जब बादलों की बेरुखी से फसलों पर संकट मंडराने लगता है, तब यहाँ की लोक आस्था और सदियों पुरानी परंपराएं जीवंत हो उठती हैं. ऐसी ही एक अनूठी परंपरा ‘धाड़’ सोमवार को कुआं, मोरा सारण, डूंगरवाड़ा सहित आसपास के गांवों में देखने को मिली. क्षेत्र में अच्छी बारिश की कामना को लेकर महिलाओं ने पुरुषों का वेश धारण कर गांव की गलियों में पारंपरिक जुलूस निकाला और इंद्रदेव से प्रार्थना की.
धोती-कुर्ता और साफे में निकलीं महिलाएं


सफेद धोती-कुर्ता, सिर पर साफा, हाथों में लाठी, तलवार और कृषि उपकरण धारण किए महिलाओं का यह जुलूस ग्रामीण संस्कृति का अद्भुत संगम बना. जुलूस के दौरान युवा और बुजुर्ग महिलाएं ढोल की थाप पर पारंपरिक भजन-कीर्तन करती हुई पूरे गांव में घूमीं. गूंजते लोकगीतों और वर्षा अनुष्ठान से पूरा माहौल आस्था और लोक विश्वास के रंग में रंग गया.
पीढ़ियों से चली आ रही है मान्यता
ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. मान्यता है कि जब मानसून की बेरुखी से सूखा पड़ने की स्थिति बनती है, तब महिलाओं द्वारा पुरुषों का रूप धारण कर ‘धाड़’ निकालने से इंद्रदेव प्रसन्न होते हैं और झमाझम बारिश होती है. इसी विश्वास के साथ ग्रामीण आज भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं.
सांस्कृतिक धरोहर और एकजुटता का संदेश
आधुनिकता के इस दौर में भी वागड़ की यह ‘धाड़’ परंपरा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिक एकजुटता और लोक संस्कृति के संरक्षण का सशक्त संदेश देती है. ग्रामीणों ने एक स्वर में क्षेत्र में शीघ्र अच्छी वर्षा होने तथा फसलों के लहलहाने की कामना की.

