बांसवाड़ा शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के बाद बांसवाड़ा जिले के शिक्षकों का आक्रोश फूट पड़ा है. अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के देशव्यापी आह्वान पर गुरुवार को जिला मुख्यालय पर सैकड़ों शिक्षकों ने उग्र प्रदर्शन किया. अपनी सेवा-सुरक्षा को लेकर चिंतित शिक्षकों ने जिला कलेक्टर के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन भेजकर इस मामले में तुरंत कानूनी संशोधन (विधायी हस्तक्षेप) की मांग की है.
क्या है पूरा मामला?
शिक्षकों के अनुसार, आरटीई अधिनियम 2009 और एनसीटीई की 2010 की अधिसूचना के तहत वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को योग्य मानते हुए टीईटी से स्थायी छूट दी गई थी. वहीं, 2010 के बाद नियुक्त शिक्षकों के लिए निश्चित अवधि में टीईटी पास करना जरूरी था. लेकिन न्यायालय के नए फैसले ने इस कानूनी अंतर को खत्म कर दिया है, जिससे दशकों से सेवा दे रहे वरिष्ठ शिक्षकों की नौकरी पर भी संकट मंडराने लगा है.
देशभर के 20 लाख शिक्षकों पर पड़ेगा असर
महासंघ के संभाग संगठन मंत्री दिलीप पाठक ने कहा कि दशकों से शिक्षा व्यवस्था को सींच रहे अनुभवी शिक्षकों पर अचानक टीईटी थोपना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है. वहीं, प्रदेश मीडिया प्रकोष्ठ के आशीष उपाध्याय ने चेताया कि इस फैसले से देशभर के 20 लाख से अधिक शिक्षक प्रभावित होंगे, जिससे स्कूली शिक्षा व्यवस्था पटरी से उतर जाएगी.
प्रधानमंत्री से महासंघ की 3 प्रमुख मांगें:
- सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश केवल भविष्य में होने वाली नई नियुक्तियों पर ही लागू किया जाए.
- वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त सभी शिक्षकों की सेवा-सुरक्षा, वरिष्ठता, पदोन्नति और गरिमा की रक्षा हो.
- केंद्र सरकार आवश्यक कानूनी संशोधन कर लाखों शिक्षक परिवारों को सड़क पर आने से बचाए.
आर-पार की लड़ाई का ऐलान: प्रदर्शन में जयदीप पाटीदार, कमल सिंह सोलंकी, दिलीप पंवार सहित सैकड़ों शिक्षक और पदाधिकारी मौजूद रहे. शिक्षकों ने एक स्वर में कहा कि जब तक उनके वैधानिक अधिकारों की रक्षा नहीं हो जाती, महासंघ का यह लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रहेगा.

