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डूंगरपुर: शिक्षकों के तबादले निरस्त नहीं हुए तो स्कूलों पर लगेंगे ताले, BAP ने दी उग्र आंदोलन की चेतावनी

डूंगरपुर राजस्थान में शिक्षकों के हालिया तबादलों को लेकर राजनीतिक पारा गरमा गया है. भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने प्रदेश सरकार की तबादला नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए मोर्चा खोल दिया है. पार्टी नेताओं ने सरकार पर मनमाने और द्वेषपूर्ण ढंग से ट्रांसफर करने का आरोप लगाया है. बीएपी ने साफ अल्टीमेटम दिया है कि अगर ये मनमाने तबादले तुरंत निरस्त नहीं किए गए, तो पूरे क्षेत्र में स्कूलों पर तालाबंदी कर उग्र आंदोलन किया जाएगा.

अनुसूचित क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप

बीएपी के जिलाध्यक्ष अनुतोष रोत ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि बिना किसी ठोस और पर्याप्त कारण के बड़े पैमाने पर शिक्षकों के स्थानांतरण कर दिए गए हैं. इससे विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्र (टीएसपी) के सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई का माहौल पूरी तरह चौपट हो रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि इस आदिवासी अंचल में शिक्षकों की भारी कमी के बीच तबादले करना, यहाँ के गरीब और आदिवासी विद्यार्थियों की शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर कमजोर करने की एक सोची-समझी साजिश है.

महिला और दिव्यांग शिक्षक भी परेशान, अभिभावकों में आक्रोश

जिलाध्यक्ष ने कहा कि सरकार ने संवेदनहीनता की हदें पार करते हुए महिला और दिव्यांग शिक्षकों का भी दूर-दराज के इलाकों में ट्रांसफर कर दिया है, जिससे उन्हें भारी मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. सरकार के इन गलत फैसलों के कारण अब छात्र और अभिभावक सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं. उन्होंने कहा कि शिकायतों के बाद भी प्रशासन अपनी मनमर्जी चला रहा है, जबकि प्राथमिकता विद्यार्थियों के भविष्य को दी जानी चाहिए.

झालावाड़ हादसे के बाद बजट ठिकाने लगाने का आरोप

वहीं, बीएपी के सामान्य वर्ग प्रदेशाध्यक्ष दिग्विजय सिंह चुण्डावत ने स्कूल भवनों की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए सरकार को घेरा. उन्होंने आरोप लगाया कि झालावाड़ हादसे के बाद प्रदेश के जर्जर स्कूलों की मरम्मत के लिए करोड़ों का बजट स्वीकृत हुआ था, लेकिन धरातल पर सिर्फ लीपापोती की गई। मानसून का दौर शुरू हो चुका है और स्कूल भवन अब भी असुरक्षित हैं. इस दौरान राष्ट्रीय सदस्य दिनेश रोत और अरविंद रोत सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे, जिन्होंने साफ कहा कि यदि समय रहते फैसला नहीं बदला, तो होने वाले उग्र आंदोलन की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी.

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