भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के संस्थापक और राजस्थान के बांसवाड़ा-डूंगरपुर से सांसद राजकुमार रोत ने स्विट्जरलैंड के जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र (UN) के आदिवासी अधिकार सम्मेलन में एक ऐतिहासिक और दमदार भाषण दिया है. वैश्विक मंच से देश के आदिवासियों की आवाज उठाते हुए सांसद रोत ने दोटूक कहा कि भारत के आदिवासी ही इस देश के मूल स्वदेशी समुदाय (मूल निवासी) हैं और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मान्यता मिलनी चाहिए.
भारत सरकार के पुराने दावे को किया खारिज
सांसद राजकुमार रोत ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत सरकार के उस पुराने रुख को सिरे से खारिज कर दिया, जिसके तहत लंबे समय से वैश्विक स्तर पर यह कहा जाता रहा है कि भारत में कोई अलग या विशिष्ट आदिवासी समुदाय नहीं हैं. रोत ने पुरजोर तरीके से कहा कि भारत में विशिष्ट आदिवासी लोग सदियों से मौजूद हैं, जिन्हें पहचानना और संवैधानिक अधिकार देना बेहद जरूरी है.
14 करोड़ आदिवासियों की रखी बात, गिनाईं 705 जनजातियां
यूनाइटेड नेशंस के इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में राजकुमार रोत ने आंकड़ों के साथ भारत का पक्ष रखा. उन्होंने बताया कि भारत में करीब 14 करोड़ आदिवासी आबादी निवास करती है. भारतीय संविधान के तहत इन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त है, जिन्हें 705 अलग-अलग विशिष्ट जनजातियों में विभाजित किया गया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड, नेग्रिटो, द्रविड़ और मंगोलॉयड मूल के ये सभी समुदाय ही भारत के असली आदिवासी और मूल निवासी हैं.
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का दिया हवाला
अपने दावों को कानूनी और संवैधानिक मजबूती देने के लिए सांसद रोत ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के साल 2011 के एक ऐतिहासिक फैसले (कैलाश बनाम महाराष्ट्र राज्य) का हवाला दिया. उन्होंने यूएन को बताया कि देश की सबसे बड़ी अदालत भी यह मान चुकी है कि भारत की लगभग 8 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति की आबादी ही यहां के मूल निवासियों की असली वंशज है.
भील समुदाय का प्रतिनिधित्व करने पर जताया गर्व
भाषण के अंत में राजकुमार रोत ने गर्व के साथ वैश्विक मंच पर अपनी पहचान रखते हुए कहा कि वह स्वयं ‘भील’ आदिवासी समुदाय से आते हैं. राजस्थान के अनुसूचित क्षेत्र के इस सबसे बड़े आदिवासी समूह का अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिनिधित्व करना उनके लिए एक विशेष गौरव की बात है.

