उदयपुर में मोहर्रम की नौवीं तारीख पर सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहजीब का एक अनोखा नजारा देखने को मिला. शहर के भड़भूजा घाटी क्षेत्र में करीब 132 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक ‘छड़ी मिलन’ की परंपरा को पूरे धार्मिक सम्मान और आपसी भाईचारे के साथ निभाया गया. केवल उदयपुर में निभाई जाने वाली यह अनूठी रस्म आज भी सामाजिक समरसता की सबसे बड़ी मिसाल बनी हुई है.

मोहर्रम के मौके पर शहर के अलग-अलग इलाकों से ताजिए गश्त करते हुए भड़भूजा घाटी पहुंचे. यहाँ मेवाफरोश समाज, नायक समाज सहित अन्य ताजिया कमेटियों की छड़ियों का मिलन कराया गया. इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में अकीदतमंद और शहरवासी मौजूद रहे.
महाराणा भूपाल सिंह के काल में हुई थी शुरुआत
कुरैशी महासभा के अध्यक्ष रेहान कुरैशी के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत महाराणा भूपाल सिंह के शासनकाल में हुई थी. उस समय ताजिया निकालने को लेकर मेवाफरोश और नायक समाज के बीच विवाद हो गया था. तब महाराणा ने अपने निजी कंपाउंडर हाजी अब्दुल बाकी को समझौता कराने की जिम्मेदारी सौंपी. हाजी अब्दुल बाकी ने सूझबूझ से दोनों पक्षों को एक साथ बैठाकर छड़ियों का मिलन करवाया। तब से आज तक यह रस्म लगातार जारी है.
पांचवीं पीढ़ी निभा रही है जिम्मेदारी
हाजी अब्दुल बाकी के निधन के बाद भी उनका परिवार इस विरासत को संजोए हुए है. वर्तमान में उनकी पांचवीं पीढ़ी इस ऐतिहासिक परंपरा को संपन्न कराने की जिम्मेदारी निभा रही है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छड़ी को कर्बला की जंग से जुड़े विशेष प्रतीक के रूप में देखा जाता है. प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ, जो उदयपुर की अटूट एकता को दर्शाता है.

